जिनवाणी सुनि उपजे आनन्द अपार | jinavani suni upaje ananda apara

जिनवाणी सुनि उपजे आनन्द अपार ।

आनन्द अपार, ज्ञान-आनन्द अपार ।। टेक ।।

मिथ्या भ्रान्ति मिटी दुखदायी, दीखे नहीं संसार।
सब कर्मों से भिन्न ज्ञानमय, दीखे निज पद सार।। 1 ।।

सिद्ध प्रभु सम अपनी प्रभुता, दीखे ध्रुव अविकार।
नहीं अवकाश विकल्पों का कुछ, देखन-जाननहार ।। 2 ।।

उछले ज्ञानमात्र आतम में, शक्तियाँ अपरम्पार ।
लखि अनुपम चैतन्य विभूति, चाह न रही लगार।। 3 ।।

तृप्त हुआ कृतकृत्य हुआ बस, यही भाव सुखकार।
मग्न रहूँ अपने में ही नित, हो वंदन अविकार ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’