तर्जः ऐसे मुनिवर देखे वन में…
जिनवाणी सुन हितकारी, भव बन्ध छुड़ावनहारी।
जातें देव-शास्त्र-गुरु साँचे, धर्म परम उपकारी ॥ टेक ॥
तत्त्वों का सम्यक् निर्णय कर, भेदज्ञान सुखकारी।
कर पुरुषार्थ स्वानुभव पावें, होवें शिवमगचारी ॥ 1 ॥
हेय रूप रागादिक त्यागें, पावें पद अविकारी।
भक्ति भाव से करें वंदना, निश दिन मंगलकारी ॥ 2 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६६ से १६७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
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