तर्जः चाह मुझे है दर्शन की…
जिनवाणी सुखकारी है, सुखकारी दुखहारी है ॥ टेक ॥
जीवन का आदर्श बतावे, परिणामों का ज्ञान करावे।
बाह्य निमित्त क्रिया समझावे, वस्तु स्वभाव सहज दरशावे ॥
चहुँ अनुयोग विचारी है ॥ 1 ॥
स्याद्वाद शैली है अनुपम, सहज नशावे मोह महातम।
अनेकांतमय तत्त्व प्रकाशे, निज-पर भेद-विज्ञान विकाशे ॥
भविजन को हितकारी है ॥ 2 ॥
धर्म अहिंसा मंगलकारी, दशलक्षणमय है अविकारी।
गुणस्थान की हो बढ़वारी, प्रगटे शिवपद आनंदकारी ॥
कर्म नशावनहारी है ॥ ३॥
विनय सहित नित ही विस्तारें, पढ़ें-सुनें निज भाव सुधारें।
सम्यक् बोधि समाधि सु पायें, अपना जीवन सफल बनायें ॥
नित प्रति धोक हमारी है॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६२ से १६३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’