जिनवाणी साँची माता हमारी,
मोह छुड़ावन हारी रे।
ज्ञान जगावन हारी रे ।। टेक ।।
जिनवाणी सन्मार्ग दिखावे,
चलना सिखावे, आगे बढ़ावे।
दोष नशावन हारी रे।। 1।।
पुण्य-पाप का फल दर्शावे,
सब संसार असार बतावे ।
धर्म सिखावन हारी रे।। 2।।
मुक्तिमार्ग निर्ग्रन्थ दिगम्बर,
नहीं क्लेश, नहीं जहँ आडम्बर।
सहज दिखावनहारी रे।। 3।।
वस्तु स्वभाव परम अविकारी,
दिखलाती माता उपकारी।
बंध मिटावनहारी रे।। 4।।
जिनवाणी हृदय में बस गयी,
दुर्भावों की संतति नश गयी।
ज्ञानकला विस्तारी रे।। 5।।
भक्ति भाव से शीस नवावें,
पढ़ें - पढ़ावें चिन्तें ध्यावें ।
हों चैतन्य विहारी रे।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४४ से १४५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’