तर्ज : गम्भीर गुरुता …
जिनवाणी साँची माता हमारी, सब ही को आनन्ददायी ।। टेक ।।
अहो ! दिव्य जिनवर की वाणी, अंग रचे सुन गणधर ज्ञानी ।
नित्य बोधिनी सुखदायी ।। सब ही को.।। 1।।
अनेकान्तमय तत्त्व बताया, भेदज्ञान का मार्ग सुझाया।
अनुभव की विधि दर्शायी ।। सब ही को. ।। 2।।
आतम अनुभव शिव सुख दाता, मिटे तत्क्षण सर्व असाता ।
मंगलमय मंगलदायी ।। सब ही को. ।। 3।।
जो नित जिनवाणी अभ्यासे, ताको मोहमहातम नाशे।
शुद्धात्म
रुचि प्रगटायी ।। सब ही को. ।। 4।।
ज्ञानमयी वैराग्य जगावे, माँ निर्ग्रन्थ दशा प्रगटावे।
करें वंदना शिर नाई ।। सब ही को.।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४५ से १४६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’