जिनवाणी माता, मेरे शीश विराजो।
जिनवाणी माता, मेरे हृदय विराजो ॥ टेक ॥
मोह महातम नाशती, जिनवाणी अविकार ।
अभ्यासो आनंद से, भविजन मंगलकार ॥ 1 ॥
हो प्रभावना ज्ञानमय, सुखी रहें सब जीव।
सत्स्वरूप पहिचानकर, धर्मामृत नित पीव ॥ 2 ॥
जिनवाणी अभ्यास से, निर्मल भाव सु होंय।
सहज कर्म बंधन करें, मुक्त भव्यजन होंय॥ ३॥
परम प्रीति से वंदना, करो नित्य सुखदाय ।
दिन दूना वात्सल्य हो, सब संक्लेश नशाय ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’