तर्ज : जिनशासन की प्रभावना…
जिनवाणी माँ की वंदना, उल्लास से करो।
जिनवाणी का स्वाध्याय, नित उत्साह से करो।। टेक ।।
अक्षर शुद्धि अर्थ पहिचानो, शब्द-अर्थ दोनों संग जानो।
योग्यकाल में यथा विधि, स्वाध्याय नित करो।। 1।।
नाम गुरु का नहीं छिपाओ, मिथ्या अहंकार नहीं लाओ।
बार-बार अभ्यासो अरु, उपधान तुम करो ।। 2।।
शास्त्रों का बहुमान सु करना, विनय भाव अपने में धरना।
तत्त्वों का सम्यक् निर्णय कर, स्वानुभव करो।। 3।।
बारम्बार भावना भाओ, ज्ञानमयी वैराग्य बढ़ाओ ।
साक्षात् मुक्ति का कारण, पद निर्ग्रन्थ धरो ।। 4।।
ध्याओ अविरल आत्म स्वरूप, प्रगटाओ अक्षय शिव रूप ।
जिनवाणी माँ को माँ कहना, यों सार्थक करो।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४३ से १४४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’