तर्ज : धन्य-धन्य आज घड़ी कैसी…
जिनवाणी जीवन में, सुख का आधार है।
महिमा अपार है, महिमा अपार है ।। टेक ।।
जिस तम को दीप चंद्र, सूर्य भी न हर सकें।
जिनवाणी माता ही, मोह तम को हरे।।
सम्यग्ज्ञान का प्रकाश, होय सुखकार है। । महिमा. ।। 1 ।।
जिनवर की दिव्यध्वनि, गणधर सम्हारि कै ।
द्वादशांग रचना की, भवि हित विचारि कै।।
चार अनुयोगमय, महा मंगलकार है ।। महिमा. ।। 2 ।।
वस्तु के स्वरूप को, माँ ही बताती है।
वीतरागी संतों से, माँ ही मिलाती है।।
सिखलावे ज्ञान-वैराग्य हितकार है ।। महिमा. ।। 3।।
जिनवाणी माता की हम, करें प्रभावना।
तत्त्वबोध पावें सब, ये ही एक भावना।।
भक्ति से प्रीति से वंदना अविकार है ।। महिमा. ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७३ से १७४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’