जिनवाणी जीवन का आधार है।
जिनवाणी जीवन का श्रृंगार है ॥ टेक ॥
जिनवाणी शुद्धात्मा हूँ दिखाती।
स्याद्वाद से देह भिन्न बताती ॥ 1।।
मोहादि दुख मूल कारण बताती।
रत्नत्रय ही सुख कारण दिखाती ॥2।।
कहती है संसार असार है ।
सहज ही अज्ञानतम को हरे है ॥ 3 ।।
सहज ही पापों को दूर करे है।
ज्ञान भंडार सहज ही भरे है ॥ 4 ।।
सब ही समाधान सम्यक् करे है।
गूँजे गगन में जयकार है॥5।।
प्रभुवर का आदर्श हमको दिखावे।
मुक्ति के मार्ग में सबको लगावे ॥ 6 ।।
ज्ञान और वैराग्य क्षण-क्षण बढ़ावे ।
कर्मों के बन्धन सहज ही छुड़ावे ॥7 ।।
त्रिभुवन में जिनवाणी ही सार है।
जिनवाणी सब ही सुनें और सुनावें ॥8।।
अन्तर में साधर्मी प्रेम बढ़ावें।
प्रगटावें धर्म अहिंसा महान् ॥ ९।।
सदा सर्व जीवों का हो कल्याण।
भक्ति सहित नित नमस्कार है ।। १०।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६७ से १६८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’