जिनवाणी जग में सुखदाय, पढ़ो सुनो भवि शीश नवाय | jinavani jaga mem sukhadaya pa dho suno bhavi shisha navaya

तर्ज : रोम रोम पुलकित हो जाय…

जिनवाणी जग में सुखदाय, पढ़ो सुनो भवि शीश नवाय।
मुक्ति का मारग दरशाय, सहज रूप निज तत्त्व दिखाय ॥ टेक ॥
निज-पर भेदज्ञान प्रगटाय, उपादेय अरु हेय बताय ।
साम्यभाव का यत्न सिखाय, वैभाविक दुष्कर्म नशाय ॥ 1 ॥

सबसे मैत्री भाव जगाय, गुणीजनों में मोद सिखाय।
दुखियों प्रति करुणा दर्शाय, दुर्जन प्रति माध्यस्थ रहाय ॥ 2 ॥

संयोगों की रुचि विनशाय, विषयों की आसक्ति मिटाय।
परिग्रह की मूर्छा छुड़वाय, निर्ग्रन्थ मार्ग रही दर्शाय ॥ 3 ॥

अपने घर का विभव बताय, अपने हित की बात सुनाय।
लोकोत्तर उपकार कराय, भव दुःखों से लेय बचाय॥ 4 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ८८ से ८९

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