तर्ज : जिनवाणी सुन उपदेशी खोल ले …
जिनवाणी हम सबको सुखकारी, सुखकारी, आनन्दकारी ।। टेक ।।
वस्तु स्वरूप सहज दर्शावे, मंगलमय मंगलकारी।
सुनत भेदविज्ञान होत है, स्वानुभूति हो अविकारी।। 1।।
सब परिणमन स्वतंत्र बतावे, कर्तृत्व नाशे दुःखकारी।
भोग-रोग सम महाक्लेशमय, ज्ञाता भाव आनन्दकारी ।। 2 ।।
पुण्य-पाप दोऊ संसारा, वीतरागता हितकारी।
आश्रय योग्य एक शुद्धातम, जानि नमूँ जग हितकारी ।। 3 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’