जिनवाणी अमृत झरे, पीवे सो शिव पद लहे ।। टेक ।।
भव के भाव रहित शुद्धातम, ज्ञानमात्र शाश्वत परमातम ।
निरपेक्ष ज्ञायक रहे, समझे सो शिवपद लहे ।। १।।
उत्तमार्थ परमार्थ आत्मा, शरणभूत एक मात्र आत्मा।
जिनवाणी सत्य कहे, समझे सो शिवपद लहे ।। २ ।।
नव तत्त्वों से न्यारा आतम, नित्य निरंजन निज शुद्धातम।
पक्षातिक्रान्त गहे, सहज ही शिवपद लहे।। ३।।
स्वयं-स्वयं में पूर्ण आत्मा, सारभूत आदेय आत्मा।
निज में ही तृप्त रहे, सहज ही शिवपद लहे।। 4।।
सुन जिनवाणी तत्त्व पिछाने, अन्तर्मुख हो निज पद जाने ।
निज में ही थिरता धरे, सहज ही शिव पद लहे ।। 5 ।।
संकट त्राता, आनन्ददाता, लोकोत्तर जिनवाणी माता।
नित प्रति शीश धरे, सहज ही शिवपद लहे ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४७ से १४८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’