तर्ज : सुनकर वाणी जिनवर की…
जिनमुद्रा से झरे परम रस, आनन्द उर न समाय रे।
भेदविज्ञान जगे दर्शन से, मोह सहज विनशाय रे ।। टेक ।।
सारभूत अपनो शुद्धातम, सहज प्रत्यक्ष जनाय रे।
निज में तृप्ति, निज में तुष्टि, और न कछु सुहाय रे ।।। ।।
पर में इष्ट-अनिष्ट कल्पना, नहीं कदापि उपजाय रे।
सब ही ज्ञेयपने प्रतिभासे, वीतरागता भाय रे ।।2।।
अहो ! अलौकिक मुद्रा प्रभु की, सहज शीश नम जाय रे ।
अपनी प्रभुता आपहि दीखे, मुक्ति द्वार खुल जाय रे ।।3।।
जगे नाथ पुरुषार्थ परम, निर्ग्रन्थ दशा विलसाय रे।
और न वांछा यही भावना, तुम सम पद प्रगटाय रे।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’