तर्जः अमायन नगर में पंचकल्याणक…
जिनमंदिर में धर्म महोत्सव ।
छाया हर्ष महान् रे, पावें पथ निर्वाण रे ।। टेक ।।
हिल-मिलकर सब भक्ति रचावें, हर्ष-हर्ष प्रभु के गुण गावें।
करें भेद-विज्ञान रे।। पावें. ।। 1 ।।
प्रभु की वाणी सुनें-सुनावें, मोह-महातम दूर भगावें।
करें स्व-पर कल्याण रे ।। पावें. ।। 2 ।।
पाप वासना हो निर्मूल, समझें जगत् विभव सब धूल।
धारें आतम-ध्यान रे ।। पावें. ।। 3 ।।
मलिन विकल्प न हों दुखकारी, होवें अप्रमत्त अविकारी।
नशें कर्म दुखखान रे।। पावें ।। 4 ।।
दुखमय आवागमन मिटावें, निज अक्षय प्रभुता प्रगटावें।
बनें स्वयं भगवान् रे ।। पावें. ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’