तर्जः अमायन नगर में पंचकल्याणक …
जिनमंदिर में धर्म महोत्सव, गूँजे जय-जयकार रे।
आनन्द अपरम्पार रे ।। टेक ।।
जन्म-जन्म का पुण्य खिला है, उत्तम अवसर आज मिला है।
भक्ति करें सुखकार रे।। आनन्द. ।। 1 ।।
पंच-परमेष्ठी को शीस नवावें, निर्मल भेदज्ञान प्रगटावें।
भाव धरें अविकार रे।। आनन्द ।। 2।।
अरहंत मंगल, सिद्ध सु-मंगल, साधु मंगल धर्म सु-मंगल ।
ध्रुव मंगल समयसार रे।। आनन्द. ।। 3 ।।
अरहंत उत्तम, सिद्ध सु उत्तम, साधु उत्तम, धर्म उत्तम।
परमोत्तम शुद्धात्म रे।। आनन्द.।। 4।।
अरहंत शरणं, सिद्ध सु शरणं, साधु शरणं, धर्म सु शरणं।
अनन्य शरण शुद्धात्म रे ।। आनन्द. ।। 5 ।।
भक्ति से पूजें जिनराज, पावें निश्चय सिद्ध समाज।
आवागमन निवार रे।। आनन्द. ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३ से २४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’