तर्जः लखी-लखी…
जिनमंदिर में आओ-आओ, भविजन मिलकर आओ।
बालयती प्रभु के दर्शनकर, ब्रह्म भावना भाओ ।। टेक ।।
क्यों अनित्य अशरण दुःखकारी, भोगों में भरमाओ।
अति दुर्लभ नरभव जिनशासन, फिर पीछे पछताओ।। 1।।
मूढ़ों के सम विषयों में फँस, क्यों निज धर्म गँवाओ ।
ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके, मुक्तिमार्ग में आओ।। 2।।
महाभाग्य से पाये जिनवर, हरष-हरष गुण गाओ।
भेदज्ञान नित ही अभ्यासो, भाव विशुद्धि बढ़ाओ।। 3।।
हो अकलंक समान प्रभु की, जय से नभ गुँजाओ।
परम अहिंसा की जग भर में, धर्म ध्वजा फहराओ।। 4।।
महा भयानक अक्ष सुखों को, नहीं स्वप्न में चाहो।
निज स्वभाव का आराधन कर, अक्षय सुख प्रगटाओ ।। 5।।
इधर-उधर मत देखो भाई ! प्रभु की ओर लखाओ।
प्रभु के पथ का करो अनुशरण, जीवन सफल बनाओ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८ से १९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’