तर्जः दरबार तुम्हारा…
जिनमंदिर आते सुखकारी है,
दर्शन करके आनन्द हुआ।
जिन प्रतिमा अति मनहारी है,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। टेक ।।
संसार मरूस्थल में स्वामिन्,
है कल्पवृक्ष सम जिनमंदिर।
यह मिथ्यामोह नशाता है,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। 1।।
चिन्तामणि से भी अधिक हमें,
जिनबिम्ब लगें मंगलकारी।
बिन चिन्ते ही शिवसुख देवें,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। 2।।
अद्भुत आतम वैभव दीखे,
अक्षय प्रभुता दिखलाती है।
वैराग्य उमड़ता है उर में,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। 3।।
हे जिनवर जब से देखा है,
पर-आश्रित भाव पलाया है।
समता का भाव जगाया है,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। 4।।
चरणों में शीस सहज झुकता,
भक्ति का वेग बहे जब ही।
सन्तुष्ट हुआ, कृतकृत्य हुआ,
दर्शन करके आनन्द हुआ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २१ से २२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’