जिनके हृदय जिनराज बसे, उनको भय कैसे हो।
जिन स्वयं सिद्ध चिद्रूप लखा, उनको भय कैसे हो ।। टेक ।।
अग्नि जलावे मात्र देह को, पानी देह गलावे,
योद्धा मारे मात्र देह को, मुझे न छूने पावे ।
यों चिंतन करते हैं ज्ञानी, निज में निर्भय हो ।। उनको. ।। 1 ।।
चोर चुरावे बाह्य सम्पदा, मम वैभव अविनाशी,
लक्षपती अपनी लक्ष्मी से, रहूँ सदैव अयाची।
भेदज्ञान वर्ते अंतर में, तृप्त स्वयं में हो ।। उनको. ।। 2।।
कर्म रोग ही जिसे न होवे, बाह्य रोग क्यों होवे,
अशरीरी प्रभु ज्ञान शरीरी, नित्य निरंजन शोभे ।
सहज ज्ञान का ही वेदन, दुर्वेदन अन्य न हो।। 3।।
गुप्त सहज ही निज स्वभाव में, पर का नहीं प्रवेश,
पूर्ण ज्ञानघन, नहीं स्वयं में पर भावों का लेश।
स्वाभाविक प्रभुता से ही, प्रभु पामरता रंच न हो।। 4।।
ज्ञायकमय ही लोक है शाश्वत, शाश्वत वास करें,
ज्ञानमयी साम्राज्य सदा, निष्कंटक राज्य करें।
पूर्ण सहज ही तृप्त सहज ही, नित जयवन्त अहो।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३३६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’