तर्ज : जिन दीक्षा लेके जंगल में जाँय सुकमाल…
जिनदीक्षा लेके जंगल में जाऊँ जिनराज ।
एकाकी वन में शुद्धातम ध्याऊँ जिनराज । ।टेक ।।
जब तैं निज अनुभव रस प्रगटयो, और न कछु सुहाय।
भोग भुजंग समान भयानक, जगत् असार दिखाय ।।। ।।
सहज अकम्प परम आनन्दमय, जाननहार जनाय ।
घोर परीषह उपसर्गों से, नाहीं चित्त चलाय ।।2।।
राग कौन से द्वेष कौन से, करूँ व्यर्थ अकुलाय।
जड़ चेतन की निज-निज परिणति, भिन्न-भिन्न विलसाय ।।३।।
जग के झूठे सपने सारे, व्यर्थ रह्यो भरमाय।
सम्यक् भेदज्ञान उर प्रगट्यो, नहीं संबंध दिखाय।।4।।
लूं निर्दोष महाव्रत समिति, पंचेन्द्रिय जय पाय।
षट् आवश्यक शेष गुणों में, नहीं दोष उपजाय।।5।।
उदासीनता सहज रूप हो, रहे न लेश कषाय।
अपनी प्रभुता अपने में ही, सहजपने विलसाय ।।6।।
नहिं कुछ चिन्ता नहिं कुछ वाँछा, अविचल ध्यान लगाय।
कर्म कलंक जलाय के स्वामिन्, अविनाशी पद पाय ।।7।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २०२
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १११ से ११२