जिनधर्म के हम हैं अनुयायी, जिनधर्म की शान बढ़ायेंगे।
जिनवर, जिनवाणी, जिनगुरुओं की सम्यक् श्रद्धा लायेंगे ।। 1 ।।
तत्त्वों का सम्यक् निर्णय करके, भेदज्ञान अपनायेंगे।
शुद्धातम की अनुभूति कर, निश्चय सम्यक् प्रगटायेंगे।। 2 ।।
इन्द्रिय भोगों से हो उदास, वैराग्य भावना भायेंगे।
हिंसादिक पापों को तजकर, सम्यक् चारित्र अपनायेंगे ।। 3 ।।
है तरण-तारिणी जिनवाणी, नित ही अभ्यास बढ़ायेंगे।
खुद पढ़ें-सुनें अति प्रीति से, सबको भी सहज पढ़ायेंगे ।। 4 ।।
सब जीवों में मैत्री धारें, दुखियों पर करुणा लायेंगे।
गुण ग्रहण करें नित गुणियों से, अन्तर प्रीति बढ़ायेंगे ।। 5 ।।
नहीं द्वेष दुर्जनों पर लावें, माध्यस्थ भावना भायेंगे।
दूर भगायें बुरी रीतियाँ, सब पाखण्ड मिटायेंगे।। 6।।
स्याद्वाद से अनेकान्तमय, वस्तु स्वरूप सिखायेंगे।
परम अहिंसा की जग भर में, धर्म ध्वजा फहरायेंगे।। 7।।
कल्याण करें हम निज-पर का, सब बैर-विरोध नशायेंगे।
रत्नत्रय का आराधन कर, हम परम साध्य को पायेंगे ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४९ से २५०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
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