जिनधर्म हमको लागे प्यारा ।। टेक ।।
दशलक्षणमय, रत्नत्रयमय, परम अहिंसामय सुखकारा।
सर्व दुःखों से सहज छुड़ाकर, देवे शिव सुख अपरम्पारा।। 1।।
धर्म सहज स्वभाव अहो आतम का, स्वाश्रय से प्रगटे अविकारा।
आधि-व्याधि-उपाधि न जामें, परम समाधि स्वरूप निहारा।। 2 ।।
आदि न जाको, अन्त न जाको, श्री सर्वज्ञ प्रणीत अविकारा।
मंगल उत्तम शरण यही है, वीतरागता तिहुँ जग सारा।। 3।।
महाभाग्य जिनधर्म सु पाया, अनुपम रत्न सुगुण भंडारा।
स्वानुभूति करि धारो भाई, याही से हो भव से पारा।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’