तर्ज : धन्य-धन्य आज घड़ी …
जिनधर्म हमको है प्राणों से प्यारा।
इससे ही पावेंगे शिवसुख अपारा।। टेक।।
धर्म तो वस्तु स्वभाव सही है।
धर्म तो परम अहिंसामयी है।।
उत्तम क्षमादि दशलक्षण हितकारा।। 1।।
सम्यक् दर्शन मूल धरम का।
सम्यक् ज्ञान प्रकाशक मरम का।।
चारित्र कर्म कलंक दहनहारा।। 2।।
मूल प्रणेता हैं सर्वज्ञ स्वामी।
धर्म स्वानुभवमय अभिरामी।।
मोह-क्षोभ शून्य परिणाम अविकारा।। 3।।
धर्म के नाम पर मूढ़ भ्रमावें।
स्याद्वादी निःशंक निजमाँहि पावें।।
निर्ग्रन्थ आनन्दमय धर्म है हमारा।। 4।।
निशदिन करें हम इसी की प्रभावना।
वैभव की, भोगों की, ख्याति की चाह ना।।
बोधि-समाधि का लक्ष्य सुखकारा।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’