जिनदर्शन सुखकार, जय जयकार
(तर्ज - लिया प्रभु अवतार…)
जिनदर्शन सुखकार, जय जयकार, जय जयकार, जय जयकार ।
प्रभु दर्शन सुखकार, जय जयकार, जय जयकार, जय जयकार ।।टेक।।
जग में है जिनरूप अलौकिक, मिलती जिससे शान्ति अलौकिक ।
भव दुख भंजनहार, जय जयकार… ।।1।।
देखो प्रभु का कैसा ध्यान, गुण चिन्तत हो भेदविज्ञान ।
आनन्द अपरम्पार जय जयकार… ।।2।।
वीतराग परिणति अविकारी, परम अनन्त चतुष्टय धारी ।
साँचे तारणहार, जय जयकार… ।।3।।
दिव्य तत्त्व प्रभु ध्वनित हुए हैं, भव्य सहज प्रतिबुद्ध हुए हैं ।
तिहूँ जग मंगलकार, जय जयकार… ।।4।।
हम भी यही भावना भावें, प्रभु जैसे निज गुण प्रगटावें ।
वन्दन शत-शत वार, जय जयकार… ।।5।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ४४ से ४५