जिन के भजन में मगन रहु रे
जिन के भजन में मगन रहु रे !
जो छिन खोवै बातनिमांहिं, सो छिन भजन करैं अघ जाहिं ॥ १ ॥
भजन भला कहतैं क्या होय, जाप जपैं सुख पावै सोय ॥ २ ॥
बुद्धि न चहिये तन दुख नाहिं, द्रव्य न लागै भजनकेमाहिं ॥ ३ ॥
षट दरसनमें नाम प्रधान, ‘द्यानत’ जपैं बड़े धनमान ॥ ४ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७२
अर्थ
अरे भाई! जिनेन्द्र के भजन में मग्न रहो, उनके भजन में लगे रहो। जो एक क्षण भी बातों में गवाता है, वह यदि उस एक क्षण में भजन करता तो पापों का नाश कर लेता। भजन को मुँह से कहने से कोई लाभ नहीं होता। उसका निरंतर अंतःकरण से जाप करते रहने से ही सुख की प्राप्ति होती है। देह के दुःखों में बुद्धि मत लगा, भजन करने में कोई धन नहीं लगता। अर्थात् भजन करने के लिए द्रव्य नहीं जुटाना पड़ता। छहों दर्शनों में प्रभु का नाम/प्रभु की भक्ति ही प्रमुख है। द्यानतराय कहते हैं कि जो उस नाम को जपते हैं, वे धन्य होते हैं, भाग्यशाली होते हैं।
कर। उनकी भक्ति करने से सुख आता है, उनके स्मरण से दुःख दूर हो जाते हैं। जो अपने ध्यान में उन्हें निरन्तर सम्मुख रखता है उसके सारे भय, दुःख डरकर दूर हो जाते हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी, चूहे, पक्षी, राज्य पर आक्रमण आदि बाधाएँ निकट नहीं आतीं। जिनेन्द्र-स्मरण से पापनाशन की एक धारा निरंतर बहती है। विघ्न अड़चनों की पीड़ा दाह धुल जाती है, मिट जाती है। तीन लोक में यश होता है और हृदय में, मन में शान्ति होती है। द्यानतराय कहते हैं कि कहाँ तक कहें जिनेन्द्र का स्मरण, उनकी भक्ति भव-भव की दुःखरूपी अग्नि को शमन करने के लिए नीर की शीतल अनुभूति के समान है। इन्द्र, चन्द्र आदि देवगण उनकी सेवा हेतु सदैव तत्पर रहते हैं।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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