जिन गुण गावा हरषावा, उत्सव मनावा आवा।
सभी गुण धारी धारी, सभी गुण धारी॥टेक॥
आत्म ज्ञान में सहज ही शांति, छाज रही छाज रही।
रत्नत्रय की मधुर बांसुरी, बाज रही बाज रही॥
सब मिल मंगल गाते, दर्शन कर जिन वैभव।
महा पुण्यकारी कारी, महा पुण्यकारी॥
प्रभु पद ध्यावा उलसावा, विनय विवेक बढ़ावा।
महा सुखकारी कारी, महा सुखकारी॥१॥
सबके सम्मुख शांत भाव, सोहना सोहना।
सरल भाव मनोज्ञ बना, मन मोहना मोहना॥
स्वरस रस में रमते, समझ कर निज वैभव।
महा हितकारी कारी, महा हितकारी॥
अरिहंत ध्यावा हरषावा, पर का कर्तृत्व मिटावा।
ज्ञाता दृष्टा अपनावा, महा ऋद्धिधारी धारी, महा ऋद्धिधारी॥२॥
निज के अंदर रहे शुद्धता, स्वयं जिएँ सुखम जिएँ।
अनुभव रसमय झरी गिरा, अमृत पिएँ अमृत पिएँ॥
दृष्टि आतम रस भोगे, धर्म अहिंसा जग में।
महा शांतिकारी कारी, महा शांतिकारी॥
सिद्ध पद ध्यावा उलसावा, विश्व को ज्ञेय बनावा।
चेतन को ध्येय बनावा, महा सिद्धिधारी धारी, महा सिद्धिधारी॥३॥
Artist: ज्ञात नहीं (ऑडियो में गायक का नाम नहीं है)
स्रोत: भजन की ऑडियो रिकॉर्डिंग से लिखित, जैसा गाया गया है।
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