जिन छवि तेरी यह, धन जगतारन
जिन छवि तेरी यह, धन जगतारन ।।टेक।।
मूल न फूल दुकूल त्रिशूल न, शमदमकारन भ्रमतमवारन ।।जिन.।।
जाकी प्रभुताकी महिमातैं, सुरनधीशिता लागत सार न ।
अवलोकत भविथोक मोख मग, चरत चरत निजनिधि उरधारन ।।१।।
जजत भजत अघ तौ को अचरज? समकित पावन भावनकारन ।
तासु सेव फल एव चहत नित, ‘दौलत’ जाके सुगुन उचारन ।।२।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २५
अर्थ
अर्थ-हे जिनेन्द्रदेव आपकी यह मुद्रा धन्य है, संसार-सागर से भव्य जीवों को पार उतारनेवाली है। आपकी इस मुद्रा पर न कोई मूल है, न फूल है, न दुकूल (वस्त्र) है और न ही कोई त्रिशूल आदि है। आपकी मुद्रा भ्रमरूपी अन्धकार को दूर करके समभाव और सयम-तपादि को उत्पन्न करनेवाली है। आपकी मुद्रा ऐसी महिमावन्त है कि उसके आगे इन्द्रपना भी अच्छा नही लगता है। आपकी मुद्रा को देखकर भव्यजीवो के समूह मोक्षमार्ग में विचरण करते है और अपने आत्मवैभव को हृदय में धारण करते है। हे जिनेन्द्र ! आपकी पूजा से यदि पाप भाग जाते है तो इसमे क्या आश्चर्य है? आपकी तो मुद्रा ही सम्यक्त्यादि पवित्र भावो को उत्पन्न करनेवाली है। कविवर दौलतराम कहते हैं कि में सदैव जिनेन्द्र-मुद्रा के सुगुणों का उच्चारण करता हुआ उसकी सेवा का ही फल चाहता हूँ।
स्रोत: दौलत विलास, पद 41।
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