जिन छवि लखत यह बुधि भयी
जिन छवि लखत यह बुधि भयी ।।टेक।।
मैं न देह चिदंकमय तन, जड़ फरसरसमयी ।।जिन.।।
अशुभशुभफल कर्म दुखसुख, पृथकता सब गयी ।
रागदोषविभावचालित, ज्ञानता थिर थयी ।।१।।जिन. ।।
परिगह न आकुलता दहन, विनशि शमता लयी ।
‘दौल’ पूरवअलभ आनँद, लह्यौ भवथिति जयी ।।२।।जिन. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २७