जिन छवि लखत यह बुधि भयी | Jin Chhavi Lakhat Yah Budhi Bhayi

जिन छवि लखत यह बुधि भयी

जिन छवि लखत यह बुधि भयी ।।टेक।।

मैं न देह चिदंकमय तन, जड़ फरसरसमयी ।।जिन.।।

अशुभशुभफल कर्म दुखसुख, पृथकता सब गयी ।
रागदोषविभावचालित, ज्ञानता थिर थयी ।।१।।जिन. ।।

परिगह न आकुलता दहन, विनशि शमता लयी ।
‘दौल’ पूरवअलभ आनँद, लह्यौ भवथिति जयी ।।२।।जिन. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २७

अर्थ

अर्थ-अहो ! जिनेन्द्रदेव की छवि देखकर अब मेरी मान्यता यह हो गयी है कि मैं शरीर नहीं हूँ, अपितु चैतन्यचिह्नवाला हूँ। शरीर तो जड़ है और स्पर्श-रसादिवाला है। जिनेन्द्रदेव की छवि देखकर मुझे शुभ-अशुभ कर्म के फलरूप सुख-दुःख में पृथक्त्व बुद्धि हो गयी है और यह भी समझ में आ गया है कि राग-द्वेष के भाव तो विभाव हैं और चंचल हैं, मात्र एक ज्ञानस्वभाव ही स्थिर है; अतः ज्ञानस्वभाव में स्थिरता हो गयी है। आज मेरी पर को ग्रहण करने सम्बन्धी आकुलता की अग्नि बुझ गयी है और मेरे हृदय में शान्ति छा गयी है। कविवर दौलतराम कहते हैं कि जिनेन्द्रदेव की छवि देखकर आज मैंने वह आनन्द प्राप्त किया है जिसे मैंने आज के पहले कभी प्राप्त नहीं किया था। आज मैने संसार की स्थिति को जीत लिया है।

स्रोत: दौलत विलास, पद 40।

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