झूठा सपना यह संसार | Jhootha Sapna Yah Sansar

झूठा सपना यह संसार

झूठा सपना यह संसार
दीसत है विनसत नहिं बार ॥झूठा. ॥

मेरा घर सवतैं सिरदार, रह न सके पल एक मँझार॥झूठा. ॥१॥

मेरे धन सम्पति अति सार, छांडि चलै लागै न अबार॥झूठा.॥२॥

इन्द्री विषै विषैफल धार, मीठे लगैं अन्त खयकार ॥झूठा. ॥३॥

मेरो देह काम उनहार, सो तन भयो छिनक में छार ॥झूठा. ॥४ ॥

जननी तात भ्रात सुत नार, स्वारथ बिना करत हैं ख्वार ॥झूठा. ॥५॥

भाई शत्रु होंहिं अनिवार, शत्रु भये भाई बहु प्यार ॥झूठा. ॥६॥

‘द्यानत’ सुमरन भजन अधार, आग लगैं कछु लेहु निकार ॥झूठा.॥७॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ९४

खोज: Jhutha Sapna Yah Sansar

अर्थ

यह संसार एक झूठा सपना है। अरे जो दिखाई देता है, उसके विनाश होने में कोई देर नहीं लगती।

मेरा घर सवतैं सिरदार, रह न सके पल एकमँझार ।। झूठा. ॥ १॥

मनुष्य अपने घर के लिए गर्व करता है मेरा घर सत्र में श्रेष्ठ है, सर्वोपरि है। पर वह घर भी एक पल में नष्ट हो जाता है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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