जीव तूँ समझ ले आतम पहला, कोई मरण समय, नहीं तेरा
जीव तूँ समझ ले आतम पहला, कोई मरण समय, नहीं तेरा ॥टेक॥
कहाँ से आया कहाँ है जाना, कौन स्वरूप है तेरा?
क्या करना था, क्या कर डाला, क्या ये कुटुम्ब कबीला॥१॥
आये अकेला जाये अकेला, कोई न संगी तेरा।
नंगा आया नंगा जाना, फिर क्या है ये झमेला ॥२॥
रेल में आता जाता मानव विघट जात ज्यूं मेला।
स्वार्थी भये सब बिछुड़ जायेंगे, अपनी अपनी बेला ॥३॥
पापाचार किया धन संग्रह, भोगत सब घर भेला ।
पाप के भागी, कोई नहीं है, भोगत दुःख अकेला ॥४ ॥
तन धन यौवन विनस जात ज्यूं, इन्द्र जाल का खेला ।
करना हो सो करले आगे, आयु अन्त की बेला ॥५ ॥
सम्यक् से कर दूर रागादि रह जा समय अकेला ।
‘चुन्नी’ मिटे अरिहन्त शरण से, जनम मरण का फेरा ॥ ६ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ८० (विभिन्न कवियों के भजन)