जयवन्तो नित जिनशासन ।। टेक ।।
जयवन्तो जग में जिनराज, जयवन्तो निर्ग्रन्थ मुनिराज ।
जयवन्तो जग में जिनवाणी, जयवन्तो नित जिनशासन ।। 1।।
आत्मा ही भगवान् बताता, आराधन का मार्ग सुझाता।
चहुँगति दुःख से सहज छुड़ाता, जयवन्तो पावन जिनशासन ।। 2 ।।
मैत्री भाव का पाठ पढ़ाता, परम अहिंसा धर्म सिखाता।
मोह महातम दूर भगाता, अनेकांतमय जिनशासन।। 3।।
साँचा वस्तु-स्वरूप दिखाता, स्व-पर भेदविज्ञान जगाता।
दुर्विकल्प सब सहज नशाता, स्वानुभूतिमय जिनशासन।। 4।।
शुद्धातममय श्री जिनशासन, अध्यातममय श्री जिनशासन।
वीतरागतामय जिनशासन, रत्नत्रयमय जिनशासन।। 5।।
पुण्योदय पाया जिनशासन, अहो! अलौकिक श्री जिनशासन।
हो पुरुषार्थ स्वयं में पावन, नित्य प्रभावैं जिनशासन।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६२ से २६३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’