तर्ज : धन्य-धन्य आज घड़ी…
जयवन्तो निर्ग्रन्थ साधु सुखकार हैं, दर्श मंगलकार हैं ।। टेक ।।
विषय कषायें सु, जिनके नहीं हैं।
आरम्भ परिग्रह भी जिनके नहीं हैं ।।
निष्काम निश्चिंत जीवन अविकार है।। 1।।
जिनके सु भावों में वर्ते शुद्धात्मा।
चर्चा में आवे सु आत्मा परमात्मा ।।
अहो ध्यान मुद्रा में दिखे नियमसार है ।। 2।।
घोर उपसर्ग भी न जिनको डिगा सकें।
देवांगनाएं भी मन ना चला सकें ।।
निष्कम्प मेरु सम अहो अनगार हैं।। 3।।
भव-रोग हरने को वैद्य के समान हैं।
निरपेक्ष बान्धव हैं शरण अम्लान हैं।।
गुरुवर की संगति सु सर्व हितकार है ।। 4।।
कब होगा मुनिवर का प्रत्यक्ष दर्शन।
ज्ञान-आनन्दमयी
चरणस्पर्शन ।।
होय सफल भावना वन्दना अविकार है।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२३ से २२४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’