जयवन्तो नेमिनाथ, जयवन्तो नेमिनाथ | jayavanto neminatha jayavanto neminatha

तर्जः जिनवाणी साँची माँ…

जयवन्तो नेमिनाथ, जयवन्तो नेमिनाथ।। टेक ।।

काल अनादि से दुःख पाये, नहीं जाना निज नाथ।
चारों गतियों में भरमाये, जैसे फिरे अनाथ।। 1।।

महा पुण्य का उदय हुआ है, आज मिले जिन नाथ।
अद्भुत शान्त छवि लख प्रभु की, हम सब हुए सनाथ ।। 2 ।।

आज प्रभो ! सद्बोध हुआ है, पहिचाना निजनाथ।
अनुभव रस प्रगटा अन्तर में, अहो ! अहो !! मुनिनाथ ।। 3 ।।

अशरण जग में मात्र दिखावे, चरण-शरण ही नाथ।
यही भावना करें साधना, चरणों में धर माथ।। 4।।

भौतिक फल की नहीं कामना, पाया चैतन्यनाथ।
निज में ही हो पूर्ण लीनता, सहज बनें जिननाथ ।। 5 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’