तर्ज : जिनवाणी साँची माँ…
जयवन्तो ज्ञायक रूप, जयवन्तो शुद्ध चिद्रूप । ।टेक ।।
पर द्रव्यों से भिन्न विराजे, सहज रूप शिवरूप।
छूता कर्मकलंक न जिसको, धरे न स्वांग विरूप । १ ।।
जन्मे नहीं मरे न कदापि, शाश्वत चेतन रूप।
बन्ध मोक्ष को नाहीं करता, सहजहि मुक्त स्वरूप ।। २ ।।
बिन मूरति चिन्मूरति अनुपम, शक्ति अनन्त स्वरूप।
महाभाग्य से अवसर आया, ध्यावें ध्येय स्वरूप ।। ३ ।।
नयपक्षों से पार प्रभु है, निश्चय सिद्ध स्वरूप।
परमानन्दमय शुद्ध आत्मा, अविचल मंगल रूप ।।४।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’