जयवन्तो गुरुदेव हृदय में जयवन्तो | jayavanto gurudeva hrridaya mem jayavanto

तर्ज : चित्स्वरूप महावीर तुम्हीं ने दरशाया…

जयवन्तो गुरुदेव हृदय में जयवन्तो ॥ टेक ॥
अहो ! स्वानुभवमय है जीवन, परम सरस हैं जिनके प्रवचन ।
शुद्धातम सबको दरशावें, मोह-अंधेरा दूर भगावें ॥ 1 ॥

सकल परिग्रह के हैं त्यागी, विषयों से अत्यंत विरागी।
ज्ञान-ध्यान-तप में अनुरागी, निज परिणति निज में ही पागी ॥ 2 ॥

आतम श्रद्धा सम्यग्दर्शन, आतम ज्ञान ही सम्यग्ज्ञान।
आत्म लीनता सम्यक् चारित्र, पायें अद्भुत रत्न महान् ॥ 3 ॥

ये ही मोक्षमार्ग है साँचा, चलें-चलावें श्री गुरुदेव ।
भव दुःखों से हमें बचाते, परम शरण हैं श्री गुरुदेव ॥ 4 ॥

भाव सहित हम करें वंदना, गुरु आज्ञा में सदा रहें।
द्रव्यदृष्टि अन्तर में वर्ते, मुक्तिमार्ग में बढ़े चलें ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १९१ से १९२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’