जयवंतो नित जैनधर्म, यथायोग्य व्यवहार धर्म।
स्वयं स्वयं का अनुभव होवे, नाशें मिथ्या मोह कर्म ॥ टेक ॥
भासें पर पदार्थ सब भिन्न, बाहर में नहीं होऊँ खिन्न।
अंतर में हो सहज अभिन्न, जानूँ जिन तत्त्वों का मर्म ॥ 1 ॥
सर्व कषायें हैं दुःखरूप, साम्यभाव ही है सुखरूप।
अहो ! निराकुल सुख पहिचान, मेटूँ चिर का मिथ्या भर्म ॥2॥
नहीं पर में उपयोग भ्रमाऊँ, हो निर्द्वन्द्व निजातम ध्याऊँ।
अपने में ही तृप्त रहाऊँ, पाऊँ प्रभु सम शाश्वत शर्म ॥ 3 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’