जयवंतो भगवंत जगत् में, जयवंतो भगवंत रे | jayavamto bhagavamta jagata mem jayavamto bhagavamta re

तर्जः वीरनाथ का मंगल शासन…

जयवंतो भगवंत जगत् में, जयवंतो भगवंत रे।

जयवंतो अरहंत जगत् में, जयवंतो अरहंत रे।। टेक।।

तुम्हारे दर्श-ज्ञान-सुख-वीरज, प्रगट भये सु अनंत रे।
लोकालोक ज्ञान में स्वामिन्, सहज रूप झलकंत रे।। 1।।

सर्व दोष बिन वीतराग छवि, इक टक निरखत भवि रे।
स्वानुभूति की निमित्तभूत है, परम शांत विलसंत रे।। 2।।

अहो ! आपकी दिव्यध्वनि में, धर्म तीर्थ प्रगटंत रे।
ध्वनित होय शाश्वत शुद्धातम, अनुपम महिमावंत रे।। 3।।

धन्य भाग्य पहिचाना प्रभु निज, चिदानंद भगवंत रे।
स्वाश्रय से सब कर्म नशावें, लहें सु भव का अंत रे।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’