तर्ज : हे वीरनाथ तुम दर्शन कर…
जय नेमिनाथ-जय नेमिनाथ,दर्शन पाकर हुआ सनाथ।। टेक।।
दुख के कारण पर द्रव्य नहीं, दुःख के कारण पर भाव अरे।
सुख के कारण पर द्रव्य नहीं, सुख का कारण निजभाव अरे ।।
जाना ये ही है सत्य नाथ ।। 1।।
निज शान्ति निज में ही स्वामिन् ! सुख सागर निज में लहरावे।
शुचिता-प्रभुता निज में ही है, अन्तर दृष्टि से प्रगटावे ।।
हूँ तृप्त स्वयं में सहज नाथ।। 2।।
आतम हित हेतु विराग ज्ञान, हित का कुछ और उपाय नहीं।
स्वाश्रय पूर्वक शिव सुख प्रगटे, जिसका फिर होय अपाय नहीं ।।
पाया निज में परमार्थ नाथ ।। 3।।
न्यारा रागादिक भावों से, गुण भेद न किंचित् दिखलावे।
ज्ञेयों की भ्रान्ति दूर हुई, ज्ञायक ही अनुभव में आवे।।
जयवन्त नित्य चैतन्यनाथ।। 4।।
सविनय अद्वैत नमन प्रभुवर, बस स्वयं-स्वयं में थिरता हो।
संतुष्ट स्वयं में रहूँ विभो, फिर लेश नहीं आकुलता हो।।
बस यही भावना शेष नाथ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०२ से १०३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’