तर्ज : पारस नाम-पारस नाम मेरे प्रभु का …
जय महावीर-जय महावीर, जय-जय बोलो श्री महावीर।
वर्द्धमान सन्मति अतिवीर ।। टेक ।।
आत्मध्यान में लीन प्रभु की, मूरति अति सुखकार है।
देखो-देखो नासा दृष्टि, पद्मासन अविकार है।। 1।।
जन्म-जन्म का दुःख नशाने, शरण में आओ जिनवर की।
सम्यक् मुक्तिमार्ग प्रगटाने, भक्ति रचाओ प्रभुवर की ।। 2 ।।
वीतराग सर्वज्ञ-हितंकर, दर्श भाग्य से पाया है।
मानो शिवपद ही पाया हो, ऐसा आनन्द छाया है।। 3।।
भक्तिभाव से शीश नवाओ, तत्त्व भावना भाओ रे।
प्रभुवर के ही अनुरागी हो, स्वयं प्रभु बन जाओ रे।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’