तर्जः मोक्ष के प्रेमी हमने…
जय जिनवाणी माता, भक्ति में चित्त पागे ।
भाव यही है माता, अध्यातम ज्योति जागे ॥ टेक ॥
दुर्लभ नर जन्म पाया, जिनशासन हाथ आया।
आतम अनुभूति प्रगटे, मोहादिक दूर भागे ॥ 1 ॥
जग का रस घटता जावे, आतम रस बढ़ता जावे।
ममता की बेड़ी टूटे, इन्द्रिय सुख नीरस लागे ॥ 2 ॥
घर छोडूं वन को जाऊँ, निर्ग्रन्थ मार्ग पाऊँ।
आशा विषयों की नाँही, आरम्भ-परिग्रह सब त्यागे ॥ 3 ॥
चेतन स्वरूप भाऊँ, ज्ञायक स्वरूप ध्याऊँ ।
भव-भव के बंधन छूटें, अक्षय शिव पद प्रगटावे ॥ 4 ॥
जग में जिनशासन फैले, नाशें दुष्कर्म मैले ।
चरणों में शीश नाऊँ, बोधि समाधि आवे ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’