( तर्जः मेरे मन मंदिर… ) र।।३।।
जय-जय नेमीश्वर भगवान्, करूँ मैं परम भक्ति अम्लान ।। टेक ।।
द्रव्येन्द्रिय अरु भावेन्द्रिय से, सर्व इन्द्रियों के विषयों से।
भिन्न निजातम जान।। करूँ मैं. ।। 1।।
सहज परिणमूँ ज्ञानानन्दमय, होऊँ परम जितेन्द्रिय निर्भय ।
धारूँ ब्रह्मचर्य सुखखान।। करूँ मैं. ।। 2 ।।
द्रव्य मोह और भाव मोह से न्यारा निज को निज अनुभव से।
भाऊँ निर्मोही भगवान् ।। करूँ मैं. ।। 3।।
अपना ज्ञाता रूप निहारूँ, पर भावों को सहज विडारूँ।
करके निश्चय प्रत्याख्यान ।। करूँ मैं. ।। 4 ।।
पर में नहीं उपयोग भ्रमाऊँ, प्रभुवर निज में ही रम जाऊँ।
प्रगटे निर्ग्रन्थ रूप महान् ।। करूँ मैं. ।। 5 ।।
होवे निश्चल आतम ध्यान, कर्म कलंक नशे दुखदान।
जिनवर होऊँ आप समान ।। करूँ मैं. ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०३ से १०४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’