जय-जय कुन्दकुन्द भगवान्, नशाया अंतर का अज्ञान | jaya jaya kundakunda bhagavana nashaya amtara ka aj nana

तर्ज : मेरे मन मंदिर में आन पधारो …

जय-जय कुन्दकुन्द भगवान्, नशाया अंतर का अज्ञान ।। टेक ।।

जिसने कहना गुरु का माना, जिसने शुद्धातम सरधाना।
उस घट प्रगटे केवलज्ञान ।। नशाया. ।। 1।।

कर्म उदय रस भिन्न चखे जो, मन इन्द्रिय को भिन्न लखे जो।
पावे निज अनुभव विज्ञान ।। नशाया.।। 2।।

इष्ट संयोग में हर्ष न माने, अरु अनिष्ट से दुख न जाने ।
आश्रय वह ज्ञायक गुण जान।। नशाया. ।। 3।।

देव-धरम-गुरु का सरधाना, पूजन भजन करो नित क्यों ना।
जगाकर निज का सम्यग्ज्ञान ।। नशाया. ।। 4।।

ज्ञायक रस का रसिया होना, ज्ञान-ध्यान उस ही का होना।
कहें गुरु सुनियो अब बुधिवान ।। नशाया. ।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’