जय-जय जिनदेव शास्त्र सुगुरु महान | jaya jaya jinadeva shastra suguru mahana

जय-जय जिनदेव शास्त्र सुगुरु महान ।

दिखलाया मुझको, आत्म तत्त्व सुखखान ।। टेक ।।

आतम ही है शाश्वत परमातम, परम गुरु आतम भाई ।
द्वादशांग का सार आत्मा, आत्मधर्म ही सुखदाई ।। 1।।

आतम दर्शन सम्यग्दर्शन, आत्मज्ञान ही सम्यग्ज्ञान।
आत्मलीनता सम्यक् चारित्र, ये ही जग में तीर्थ प्रधान।। 2 ।।

आतम ही अविनाशी मंगल, आतम ही है लोकोत्तम ।
एक मात्र बस शरणभूत, निज शुद्धातम ही जाना हम।। 3 ।।

है मेरा सर्वस्व स्वयं में, पर में मेरा लेश नहीं।
आत्मन् ! हो निश्चिंत स्वयं में, अन्य कार्य कुछ शेष नहीं ।। 4 ।।

है सम्बन्ध नहीं कुछ पर से, नहीं विकार कदापि है।
प्रभुता विभुता ध्रुवता अनुपम, सिद्ध स्वरूप सदा ही है ।। 5 ।।

धन्य-धन्य है घड़ी आज की, ऐसा तत्त्व दिखाया है।
रहे अछिन्न अनन्तकाल, आनन्द प्रवाह बहाया है।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३१ से ३२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’