जय-जय-जय निर्ग्रन्थ ऋषिराज।
जय-जय कुन्दकुन्द आचार्य ।।टेक ।।
शिवपथ दरशाते, ज्ञान जगाते कुन्दकुन्द महाराज।
भव भ्रान्ति मिटाते, तत्त्व सिखाते, नमन करूँ मैं आज ।।1 ।।
शुद्धातम में मग्न सु रहते, शान्त दिगम्बर रूप।
कियो परम उपकार सु गुरुवर, रचकर ग्रन्थ अनूप । ।2।।
धर्मामृत बरसायो जिससे, हुआ सु शीतल लोक।
ज्ञान सुधारस पीते पीते, मिटा सहज सब शोक ।।3।।
याद तुम्हारी आते मुनिवर, हृदय भक्ति उमगाय।
ज्ञानमाहिं तब ज्ञानमयी, स्वरूप प्रत्यक्ष दिखाय ।।4।।
मूलसंघ के नायक गुरुवर, यही भावना मेरी।
चलूँ आपके पदचिन्हों पर, मेटूँ भव भव फेरी।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४९