तर्ज : वन्दे जिनवरम्- वन्दे जिनवरम् …
जय-जय हो प्रभु, जय-जय हो प्रभु ।
जय-जय हो प्रभु, जय-जय हो प्रभु ।। टेक ।।
धन्य हुआ प्रभु दर्शन पाया, परम प्रभु प्रत्यक्ष दिखाया।
उछले आनन्द-आनन्द प्रभो ।। जय. ।। 1 ।।
काल अनादि से जो नहीं पाया, प्रभु प्रसाद अन्तर में पाया।
ज्ञानमयी निज विभव प्रभो ।। जय. ।। 2 ।।
जैसा अपने को माना था, वैसा मैं नहीं, मिथ्याभ्रम था।
मैं शाश्वत ज्ञायक सहज प्रभो ।। जय. ।। 3 ।।
तृप्त हुआ संतुष्ट हुआ प्रभु, अहो सहज निरपेक्ष हुआ प्रभु ।
रहूँ परम निर्ग्रन्थ प्रभो।। जय. ।। 4।।
नहीं कुछ वांछा नहीं कुछ चिन्ता, स्वयं सिद्ध परिणमन अनन्ता।
निज में ही अब रम जाऊँ प्रभो ।। जय. ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’