तर्जः मेरे मन मंदिर …
जय-जय चन्द्रप्रभो भगवान, आनन्दामृत चन्द्र महान।। टेक ।।
गृहस्थपना तजकर दुःखकार, धर मुनिधर्म महा सुखकार ।
धारा निर्मल आतम ध्यान ।। आनन्दामृत. ।। 1।।
चार घातिया हुए विनष्ट, प्रगटे अनन्त चतुष्टय इष्ट।
पायो अर्हत् पद अम्लान ।।
आनन्दामृत. ।। 2।।
दिव्यध्वनि अमृत बरसाय, विभ्रम मोह दियो विनशाय ।
पाया भव्यों ने सद्ज्ञान ।। आनन्दामृत. ।। 3।।
हुए अयोगी हे जिननाथ, त्रिविध कर्म रहा न साथ।
पाया अविचल पद निर्वाण ।। आनन्दमृत ।। 4।।
आए शरण तुम्हारी देव, रत्नत्रय प्रगटे स्वयमेव ।
दीखे अन्तर में सुखखान ।। आनन्दमृत. ।। 5।।
भाव यही पुरुषार्थ बढ़ायें, परिणति निज में ही रम जाये।
मैं भी पाऊँ पंचम भाव ।। आनन्दामृत. ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’