जय-जय बोलो, जय-जय बोलो | jaya jaya bolo jaya jaya bolo

जय-जय बोलो, जय-जय बोलो,

श्री जैन धर्म की जय बोलो।। टेक ।।

सबके मन में आनन्द
छाया,
धर्म महोत्सव का दिन
आया।
हर्ष-हर्ष जिनवर गुण
गावें,
सम्यक् बोधि-समाधि पावें ।। 1।।

पंच-परमेष्ठी पूज्य हमारे,
ज्ञानानन्द दशा विस्तारे ।
भाव सहित हम शीस नवावें,
प्रभु के गुण निज में प्रगटावें ।। 2।।

जिनवाणी है मात हमारी,
तत्त्वज्ञान प्रगटावन हारी।
तत्त्वज्ञान से मोह नशावे,
साधक होकर शिवपद पावें ।। 3।।

सम्यक् दर्शन प्रगटे पावन,
ज्ञान विरागमयी हो जीवन।
राग-द्वेष मय बन्ध मिटावें,
अविनाशी निज प्रभुता पावें ।। 4।।

समवशरण सम श्री जिनमंदिर,
जिन सम जिन प्रतिमा है अंदर।
दर्शन कर सुख शान्ति पावें,
अपना जीवन सफल बनावें ।। 5।।

अन्य न कोई सुख का कारण,
तन-मन-धन जीवन हो अर्पण।
तत्त्व भावना चित में भावें,
नित्य नये मंगल सब पावें ।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’