जय श्रीवीर जिनेन्द्रचन्द्र, शतइन्द्रवंद्य जगतारं
जय श्रीवीर जिनेन्द्रचन्द्र, शतइन्द्रवंद्य जगतारं ।।टेक।।
सिद्धारथकुल-कमल-अमल-रवि, भवभूधरपविभारं ।
गुनमनिकोष अदोष मोषपति, बिपिन कषायतुषारं ।।१।।जय. ।।
मदनकदन शिवसदन पद-नमित, नित अनमित यतिसारं ।
रमाअनंतकंत अंतक-कृत, -अंत जंतुहितकारं ।।२।।जय. ।।
फंद चंदनाकंदन दादुरदुरित तुरित निर्वारं ।
रूद्ररचित अतिरूद्र उपद्रव, -पवन अद्रिपति सारं ।।३।।जय. ।।
अंतातीत अचिंत्य पहाड़ सुगुन तुम, कहत लहत को पारं ।
हे जगमौल ‘दौल’ तेरे क्रम, नमैं शीस कर धारं ।।४।।जय. ।।
भवभूधर पविभारं - संसाररूपी पर्वत के लिए भारी वज्र समान ।
अद्रि = पहाड़; क्रम - चरण ।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १०४ से १०५
अर्थ
हे जिनेन्द्ररूपी चंद्र - भगवान महावीर आपकी जय हो। आप सौ इन्द्रों द्वारा पूजित हो। आप जगत का उद्धार करनेवाले हो।
सिद्धारथकुल-कमल-अमल-रवि, भवभूधरपविभारं ।
राजा सिद्धार्थ के कुलरूपी कमल को विकसित करनेवाले विमल सूर्य हो। आप संसाररूपी पर्वत को ध्वंस करने हेतु वज्र के समान हैं; उसे खंडित करने हेतु गाज (बिजली) के समान हैं। हे मोक्षपत्ति ! आप दोषरहित हैं, गुणरूपी मणियों के भण्डार हैं और कषायरूपी वन को नष्ट करने हेतु पाले (सर्दी में खेतों में पड़नेवाली बर्फ) के समान हैं।
मदनकदन शिवसदन पद-नमित, नित अनमित यतिसारं ।
कामदेव को जीतनेवाले, मोक्ष-लक्ष्मी के घर हो। नित्य-प्रति यतिलोग साररूप में आपके चरणों की वंदना करते हैं, चरणों में शीश नमाते हैं। आप मोक्ष-लक्ष्मी के स्वामी हो। अंत में मृत्यु को जीतनेवाले अर्थात् जन्म-मरण से मुक्त हो। आप जगत का हित करनेवाले हो, कल्याणकारी हो।
फंद चंदना कंदन दादुरदुरित तुरित निर्वारं।
चंदना सती के कष्टों का, मेंढ़क के पापों का, रुद्र द्वारा किए गए उपद्रव - पर्वतों को भी उड़ा कर ले जानेवाले भीषण पवन-वेग का अविलंब शमन, निवारण करनेवाले हो।
अनंत और अचिन्त्य, अपार गुणों के धारी हो, जिनका वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है। हे जगत के सिरमौर, आपके ही पथ का अनुगामी-भक्त, मैं दौलतराम दोनों हाथ जोड़कर आपको शोश नमाता हूँ, प्रणत होता हूँ।
शब्दार्थ: भवभूधर पविभारं - संसाररूपी पर्वत के लिए भारी वज्र समान। अद्रि = पहाड़; क्रम - चरण।
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
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