जय श्रीवीर जिनेन्द्रचन्द्र, शतइन्द्रवंद्य जगतारं | Jay Shrivir Jinendrachandr Shataindravandy Jagataran

जय श्रीवीर जिनेन्द्रचन्द्र, शतइन्द्रवंद्य जगतारं

जय श्रीवीर जिनेन्द्रचन्द्र, शतइन्द्रवंद्य जगतारं ।।टेक।।

सिद्धारथकुल-कमल-अमल-रवि, भवभूधरपविभारं ।
गुनमनिकोष अदोष मोषपति, बिपिन कषायतुषारं ।।१।।जय. ।।

मदनकदन शिवसदन पद-नमित, नित अनमित यतिसारं ।
रमाअनंतकंत अंतक-कृत, -अंत जंतुहितकारं ।।२।।जय. ।।

फंद चंदनाकंदन दादुरदुरित तुरित निर्वारं ।
रूद्ररचित अतिरूद्र उपद्रव, -पवन अद्रिपति सारं ।।३।।जय. ।।

अंतातीत अचिंत्य पहाड़ सुगुन तुम, कहत लहत को पारं ।
हे जगमौल ‘दौल’ तेरे क्रम, नमैं शीस कर धारं ।।४।।जय. ।।

भवभूधर पविभारं - संसाररूपी पर्वत के लिए भारी वज्र समान ।
अद्रि = पहाड़; क्रम - चरण ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १०४ से १०५