जय श्री वीरजिन वीरजिन वीरजिनचंद
जय श्री वीरजिन वीरजिन वीरजिनचंद,
कलुषनिकंद मुनिहृदसुखकंद ।।जय श्री.।।
सिद्धारथनंद त्रिभुवनको दिनेन्द्रचन्द्र
आपवचकिरन भ्रमतिमरनिकंद ।।१।।जय श्री. ।।
जाके पद अरविन्द सेवत सुरेन्द्र वृंद,
जाके गुण रटत कटत भवफंद ।।२।।जय श्री. ।।
जाकी शान्ति मुद्रा निरखत हरखत रिखि,
जाके अनुभवत लहत चिदानन्द ।।३।।जय श्री. ।।
जाके घातिकर्म विघटन प्रघटत भये,
अनन्तदरसबोधवीरज आनन्द ।।४।।जय श्री. ।।
लोकालोकज्ञाता पैं स्वभावरत राता प्रभु,
जगको कुशलदाता त्राता पै अद्वंद ।।५।।जय श्री. ।।
जाकी महिमा अपार गणी न सकै उचार,
‘दौलत’ नमत सुख चहत अमंद ।।६।।जय श्री. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १०८ से १०९