जय शिव-कामिनि-कन्त वीर, भगवन्त अनन्तसुखाकर हैं | Jay Shiv Kamini Kant Vir Bhagavant Anantasukhakar Hain

जय शिव-कामिनि-कन्त वीर, भगवन्त अनन्तसुखाकर हैं

जय शिव-कामिनि-कन्त वीर, भगवन्त अनन्तसुखाकर हैं ।
विधि-गिरि-गंजन बुधमनरंजन, भ्रमतमभञ्जन भाकर हैं ।।जय.।।

जिनउपदेश्यो दुविधधर्म जो, सो सुरसिद्धिरमाकर हैं ।
भवि-उर-कुमुदनि मोदन भवतप, हरन अनूप निशाकर हैं ।।१।।जय. ।।

परम विरागि रहैं जगतैं पै, जगतजंतुरक्षाकर हैं ।
इन्द्र फणीन्द्र खगेन्द्र चन्द्र जग, -ठाकर ताके चाकर हैं ।।२।।जय. ।।

जासु अनन्त सुगुनमणिगन नित, गनत गनीगन थाक रहैं ।
जा प्रभुपद नवकेवलिलब्धि सु, कमलाको कमलाकर हैं ।।३।।जय. ।।

जाके ध्यान-कृपान रागरुष, पासहरन समताकर हैं ।
‘दौल’ नमै कर जोर हरन भव, बाधा शिवराधाकर हैं ।।४।।जय. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १०२ से १०३

अर्थ

हे मोक्ष-लक्ष्मी के स्वामी भगवान महावीर! आपकी जय हो, आप अनन्त सुखों की खान हैं। आप कर्मरूपी पर्वत को ढहा देनेवाले, बुद्धिमानजनों के मन को भानेवाले, भ्रमरूपी अंधकार का नाश करनेवाले सूर्य के समान हैं।

आपने गृहस्थ धर्म व मुनि धर्म - दोनों धर्मों का उपदेश दिया है, जिससे स्वर्ग व मोक्षरूपी लक्ष्मी की सिद्धि होती है, प्राप्ति होती है। आप भव्यजनों के हृदयरूपी कमल-पुष्पों को विकसित करने के लिए तथा भव-दुख के संताप से छुटकारा दिलाकर, उनका हरणकर, प्रसन्नता प्रदान करनेवाले चंद्रमा के समान हैं।

आप परम विरागी हैं, निःस्पृही हैं; फिर भी जगत के सभी प्राप्णियों का कल्याण करनेवाले - रक्षा करनेवाले हैं। इन्द्र, नागेन्द्र, खगेन्द्र, चन्द्रमा, नरेन्द्र आदि सारा जगत आपका सेवक है।

आपके अनन्त गुणरूपी मणियों को गणधर भी नित्य-प्रति गिन-गिनकर थक गए हैं, हार गए हैं। केवललब्धि से सुशोभित ऐसे प्रभु के चरण मोक्ष-लक्ष्मी के भण्डार हैं। जिनके ध्यानरूपी खड़ग/तलवार से राग-द्वेष का नाश होता है, शल्य मिटती है, समता होती है। जो भव-बाधा के हरनेवाले, मोक्षलक्ष्मी को देनेवाले हैं, दौलतराम जिनवरक हाथ जोड़कर उनकी वन्दना करते हैं।

शब्दार्थ: विधि = कर्म; भाकर = सूर्य, दुविधधर्म = निश्चय व व्यवहार धर्म, मुनि व गृहस्थ धर्म; सुरसिद्धि = स्वर्ग = मोक्ष; थाक रहे = थक गए।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

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