तर्ज: लखी-लखी …
जय पारस-जय पारस, जय-जय पारसनाथ जी ।। टेक ।।
तुमको बिन पहिचाने जिनवर, चिर से रहे अनाथ जी।
आज आपके दर्शन पाकर, हम सब हुए सनाथ जी ।। 1 ।।
इन्द्रादिक चरणों में नमते, हो नाथों के नाथ जी।
शान्त दिगम्बर मुद्रा सोहे, धरे हाथ पर हाथ जी ।। 2 ।।
दर्शाया प्रभु दिव्यध्वनि से, शाश्वत चैतन्य नाथ जी।
अन्तर में प्रत्यक्ष निहारा, धन्य हुए जिननाथ जी ।। 3 ।।
आनन्दित हो प्रभु गुण गावें, धरूँ चरण में माथ जी।
यही भावना मुक्तिमार्ग में, हो गुरुओं का साथ जी ।। 4 ।।
Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११४